Tuesday, 8 May 2018

ज़ात के सेहरा पर एक ख्याल की हुक्मरानी है 
कभी मुंसिफ कभी बेबस दिल की हमसे बड़ी बेईमानी है 
हालात ए हाज़िरा पर भी कई तबसिरे नज़र हुए 
और जो बात कहनी थी उनसे वो अब तक न हमने मानी है 
मौसमों के बदलते रंग लहजे में जब भी उतरे हैं 
क़यास ही लगाए असली वजह हमने भी कब जानी है 
वो आखरी निगाह  थी या लम्हे का एतराफ़ 
नज़र बचा कर सबसे कोई बात तो हमने बनानी है 
क़तरा क़तरा मोती बनकर ज़हन में सारे ग़म रहे 
और अब के तेरे दर पर ये सब सौग़ात चढ़ानी है
    ذات  کے  صحرا  پر  ایک  خیال  کی  حکمرانی  ہے 
کبھی  منصف  کبھی  بےبس  دل  کی  ہمسے  بڑی بے امانی  ہے 
حالات  حاضرہ  پر  بھی  کیی   تبصرے  نظر    ہوئے 
اور  جو  بات  کہنی  تھی  انسے   وہ  اب  تک  نہ  ہمنے  مانی   ہے 
موسمو  کے  بدلتے  رنگ  لہجے  مے  جب  بھی  اترے   ہیں  
قیاس  ہی  لگاہے  اصلی  وجہ  ہمنے بھی کب  جانی   ہے 
وہ   آخری   نگاه  تھی  یا  لمحے  کا   اعتراف 
نظر  بچا  کر  سبسے  کوئی  بات  تو  ہمنے بنانی  ہے 
قطرہ  قطرہ   موتی  بنکر  ذہین  مے   سارے  غم  رہے 
اور  اب  کے  تیرے  در  پر  یہ  سب  سوغات چڈھانی   ہے  

Zaat ke sehra par ek khayal ki hukmarani hai
Kabhi Munsif kabhi Bebas dil ki humse badi beimaani hai
Haalaat e hazira par bhi kayi tabsire nazar hue
Aur jo baat kehni thi unse wo ab tak na humne maani hai
Mausamo ke badalte rang lahje me jab bhi utare hain 
Qayas hi lagaaye asli wajah humne bhi kab jaani hai
Vo akhri nigah thi ya lamhe ka aetraaf
Nazar bacha kar sabse koi baat to humne banani hai
Qatra qatra  moti bankar zehen me saare gham rahe
Aur ab ke tere dar par ye sab saughat chadhaani hai

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