Saturday, 12 May 2018

Be-Chaand Raaton Me

बे चाँद रातों में
याद की पुरवाइयाँ
 जो चलती हैं
ज़हन में
कोई गुमान सा
गुज़रता है
अक्स परछाइयों का
पानी में उभरता है 
कोई साया सा सेहम कर
निकलता है
एक गली के कोने में
जैसे
कोई बच्चा अपनी छोटी सी मुट्ठी में कुछ छुपाये   
हम ख्याल की ऊँगली थाम लेते हैं !

بے  چاند راتوں میں 
یاد  کی پروایاں  
جو  چلتی  ہیں 
ذہین میں 
کوئی  گمان  سا 
گزرتا  ہے 
عکس  پرچھہیوں  کا 
پانی  میں   ابھرتا  ہے   
کوئی  سایا  سا  سہم  کر 
نکلتا  ہے 
ایک  گلی  کے  کونے  میں          
جیسے 
کوئ یبچا   اپنی  چھوٹی  سی  مٹھی  میں  کچھ  چھپا یے 
ہم  خیال  کی  انگلی  تھام  لیتے  ہیں 
Be-chaand raaton me
Yaad ki purvaaiyan
Jo chalti hain
Zehen me
Koi guman sa
Guzarta hai
Aks parchhaiyon ka
Paani me ubharta hai
Koi saaya sa sehem kar
Nikalta hai
Ek gali ke kone me
Jaise
Koi bachcha apni chhoti si mutthi me kuch chhupaye
Hum khayal ki ungli thaam lete hain!

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