Friday, 18 August 2017

Adhoori Tehreer

कितने लम्हों को
ख्याल में पिरो कर
लिखने बैठी थी
साफ़ सादा सफ्हे पर
उतारा ख्याल को क़तरा क़तरा
सतर* दर सतर
लफ्ज़ मगर ....
कुछ अटक गए थे क़तरों में
कुछ भटकते मिले सतरों में
कुछ आवारा घूमने निकल पड़े
कुछ मजबूरिये दिल से वहीँ गिर पड़े  ..
कुछ रोशनाई की दलदल में धंसे थे
कुछ क़लम की नोक में फंसे थे
रंग, बादल, बरखा, बहार सब फीके पड़ गए थे
लफ्ज़ सारे बिखर गए थे
कोई अक्स न बन पाया तस्वीर का
ज़ुबान पर ज़ायक़ा सा रह गया
इक अधूरी सी तहरीर का !
*सतर - लाइन
کتنے لمحوں کو 
خیال میں پرو کر 
لکھنے بیٹھی تھی . . . 
صاف سادہ سفحی پر 
اتارا خیال کو قطرہ قطرہ 
ستر * دَر ستر 
لفظ مگر . . . . 
کچھ اٹک گئے تھے قاترو میں 
کچھ بھٹکتے ملے سترو میں 
کچھ آوارہ گھومنے نکل پڑے 
کچھ مجبوریی دِل سے وہیں گر پڑے 
کچھ روشنائی کی دلدل میں دحنسی تھے 
کچھ قلم کی نوک میں پھنسی تھے 
رنگ ، بَا دَل ، برکھا ، بہار سب پھییکی پڑ گئے تھے 
لفظ سارے بکھر گئے تھے 
کوئی عکس نا بن پایا تصویر کا 
زُبان پر ذائقہ سا رہ گیا 
اک ادھوری سی تحریر کا ! 
* ستر - لائن





Kitne Lamho ko
Khayal me piro kar
Likhne baithi thi  ...
Saaf saada safhe par
Utara khayal ko qatra qatra 
Satar* dar satar 
Lafz magar ....
Kuch atak gaye the qatro me
Kuch bhatakte mile sataro  me
Kuch awara ghoomne nikal pade 
Kuch majbooriye dil se wahin gir pade  
Kuch roshnayi ki daldal me dhanse the
Kuch qalam ki nok me phanse the
Rang, badal, barkha, bahaar sab pheeke pad gaye the
Lafz saare bikhar gaye the
Koi aks na ban paya tasveer ka
Zuban par zayeqa sa reh gaya 
Ik adhoori si tehreer ka!
*Satar - Line
Tehreer - Write-up

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