Monday, 17 April 2017

Alfaaz


एक दिन सांझ ढले
पास आ बैठे अलफाज़
बेमसरफ* से,
बेमायने से..
हाथ पकड़े घेरा डाला
लगे आगे पीछे घूमने
कुछ हाथ आए 
कुछ पर लगा कर उड़ गए
कुछ अधूरे से
कुछ पूरे से
कहीं किसी दर्द की दासतान का हुआ बयान 
कहीं कोई किस्सा बीच में छूट गया 
कुछ लफज़ सितारों की चमक से ज़्यादा चमकदार 
कुछ रात की सियाही से गहरे काले
कुछ बेरंग से , 
कुछ बेनूर से 
अलफाज़..
कुछ अपने से
कुछ पराए से
कभी पास आकर सर सहलाते
कभी मुंह चिढ़ा कर मजाक  उड़ाते
खुद को पिरोते रहे लमहों में देर तक 
कहीं दूर से सदाएं आती रहीं 
पुराने लफज़ों की.....
अलफाज़ टिके रहे 
दहलीज़ पर 
रात भर 
सुबह को दरवाज़े पर 
राख़ पडी़ थी..
कुछ लफज़ों की
कुछ लमहों की!
**बिना किसी काम

Ek din saanjh dhale
Paas aa baithe Alfaaz
 Be-masraf* se, 
bemayene se
Hath pakde ghera daala
 Lage aage peechhe ghoomne
Kuch haath aaye
Kuch par laga kar udd gaye
Kuch adhoore se
Kuch poore se
Kahin kisi dard ki daastaan ka hua bayaan
Kahin koi qissa beech me chhoot gaya
Kuch lafz sitaron ki chamak se zyada chamakdar
Kuch raat ki syaahi se gehre kale
Kuch be-rang se 
Be-noor se 
Alfaaz..
Kuch apne se 
Kuch paraye se
Kabhi paas aakar sar sehlaate
Kabhi munh chida kar mazaaq udate
Khud ko pirote rahe lamho me der tak 
Kahin door se sadayen aati rahi 
Purane lafzo ki..
Alfaaz tike rahe dehleez par 
Raat bhar
Subah ko darwaze par
Raakh padi thi.. 
Kuch lafzo ki 
Kuch lamho ki.
                                                                                                  

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